इन्द्रधनुष

आ गई आसमान उसकी हथेली चूमने,
सबने देखा — आँखों के सामने।
फिर भी सिर्फ़ उसी को मिली वो रौशनी,
क्योंकि वो थी मेहनत की असली कमाई।

पहुंचा वो सागर की गहराइयों तक,
अकेला था — मगर हिम्मत नहीं छोड़ी।
मिल गए मोती — जलपरियों की गोद से,
बुन ली उसने खुशियों की मोतियों वाली माला।

धरती को उसने स्वर्गराज्य बना डाला,
इस बार वो अकेला नहीं था।
सबने थामा हाथ — बनी एक नई बात,
साथ हो तो सात समंदर भी कम पड़ जाएं।

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